आज के दौर में आपसी सद्भाव बढ़ाना जरूरी- रणेन्द्र
कुछ लोग संस्कृति को धर्म में विघटित कर रहे
प्रगतिशील लेखक संघ की परिचर्चा
बिलासपुर। आज फैल रही नफरत के दौर में जरूरी हो गया है कि लोग ‘गंूगी रूलाई का कोरस’ उपन्यास पढ़ें। विविधता में एकरूपता और आपसी सद्भाव को बढ़ाना जरूरी है। कुछ लोग संस्कृति को धर्म में विघटित कर रहे हैं। संस्कृति कोई धर्म नहीं है। शास्त्रीय संगीत के उद्भव में मुस्लिमों का अविस्मरणीय योगदान रहा है। डागर बन्धुओं ने शास्त्रीय संगीत को नव जीवन दिया। लुप्त होती ठुमरी और कथक को अवध में ही पुनर्जीवन मिला। आज प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित अनौपचारिक चर्चा में प्रख्यात साहित्यकार रणेन्द्र ने कहा कि संस्कृति को बचाए रखने के लिए उड़ीसा के राजा आज भी आदिवासियों के साथ भात खाते हैं।
अंग्रेजों ने आदिवासियों को अपराधी घोषित कर दिया इसलिए इतिहास में उनका ज्यादा उल्लेख नहीं मिलता। कुछ को बंधुआ मजदूर बनाया तो कुछ को आदतन अपराधी घोषित कर दिया गया।
श्री रणेन्द्र ने कहा कि आदिवासियों की लगातार उपेक्षा हुई जो उनके ‘ग्लोबल गांवों के देवता’ उपन्यास में उभकर सामने आती है। संस्कृति में परिवर्तन हो रहा है। जब प्रकृति इतनी विविधता धारण कर रही है तो मनुष्य एकरूपता में पीछे क्यों है।
अविभाजित बिहार में जन्मे और अब झारखंड में बस चुके रणेन्द्र किसी परिचय के मोहताज नहीं। उनकी कहानियां भी उपन्यास की तरह है। उनका पहला उपन्यास ‘ग्लोबल गांवों के देवता’ झारखंड में विलुप्त प्राय असुर आदिवासियों पर केन्द्रित था। ‘गायब होता देस’ में उन्होंने मुंडाओं की पीड़ा और आदिवासी क्षेत्रों में कारपोरेट की दखल की कहानी कही। उनके दो कहानी संग्रह छप्पन छुरी बहत्तर पेंच और रात बाकी भी चर्चा में रही। रणेन्द्र आज प्रदेश के गौरव साहित्यकार डा.राजेश्वर दयाल सक्सेना से मिलने भी गए।
कार्यक्रम का संचालन प्रलेस के सह सचिव अशोक शिरोडे ने किया। कार्यक्रम में रामजी राय, डा. सत्यभामा अवस्थी, हबीब खान, चंद्रप्रकाश बाजपेयी, नरेश अग्रवाल, रफीक खान, अतुलकांत खरे, मुश्ताक मकवाना, गुरूघासीदास विवि. में हिन्दी के प्रध्यापक मुरली मनोहर सिंह और बहुत से हिन्दी के विद्यार्थी उपस्थित थे।

