पर्यावरण संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाती महिलाएं…
श्रीमती श्रद्धा पाण्डेय
अध्यक्षा, सेक्रो बिलासपुर मंडल
शिप्रा पाठक की नदी यात्रा
संपूर्ण विश्व और भारत में जल संरक्षण और पर्यावरण को आधार मानकर परिर्वतन लाने की मुहिम चलाने के लिए प्रतिबद्ध ग्लोजल ( ग्लोबल वाटर मिशन ) फाउंडेशन की एंबेसडर शिप्रा पाठक च्वाटर वूमेनज् और मोक्षदायिनी मॉं शिप्रा के रूप में जानी जाती हैं । इन्होंने उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के रोहिलखंड विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की परीक्षा उर्तीण की । वाराणसी के मणिकर्णिका घाट और गंगा मैया के दर्शन ने उनके जीवन की राह बदल दी और अपनी इवेंट मैनेजमेंट का कार्य छोड़ प्रकृति की सेवा में स्वयं को समर्पित कर दिया। उन्हें जल एवं जंगल के संरक्षण में जीवन की संपूर्णता दिखने लगी । शिप्रा जी का मानना है यदि नदियां नहीं होती, तो हमारी महान सभ्यता भी नहीं होती । उनकी सोच है कि नदी के किनारे शहर बनें, संगम पर तीर्थ, छोरों पर उर्वर एवं खेती योग्य भूमि तथा तल में अनगिनत जीवों के लिए आश्रय स्थल। नदियों को पावन मानकर, उन्हें देवी मान कर पवित्र और स्वच्छ रखने की मुहिम ही सच्ची प्रकृति पूजा है, ऐसा उनका मानना है । मां नर्मदा की 3600 किलोमीटर की पदयात्रा कर चुकीं शिप्रा पाठक इस पदयात्रा के माध्यम से जल संरक्षण, स्वच्छता, वृक्षारोपण एवं पर्यावरण की रक्षा का संदेश देने का कार्य कर रही हैं । उन्होंने एक करोड़ पौधे लगाने का प्रण किया है और अभी तक मां नर्मदा के तट एवं विभिन्न नदियों के किनारे लाखों पेड़ लगाए जा चुके हैं।
शिप्रा पाठक अध्यात्म से भी लंबे समय से जुड़ी हुई हैं । पंचतत्व फाउंडेशन नामक संस्था की संस्थापक शिप्रा पाठक अभी पीलीभीत के माधोटांडा स्थित गोमती के उद्गम स्थल से बनारस के कैथी घाट तक की पैदल गोमती यात्रा पर निकल चुकी हैं। यात्रा का मुख्य उद्देश्य नदी किनारे के गांव के लोगों को नदी की स्वच्छता और पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करना है। इसके अलावा नदी के किनारे पडऩे वाले अति प्राचीन शिवालयों और धार्मिक स्थलों को सूचीबद्ध करते हुए उनके जीर्णोद्धार के कार्य के प्रति भी लोगों को संकल्पबद्ध करना उनका उद्देश्य है। कई सारे घाटों, खेतों, सडक़ों और दुर्गम रास्तों को नापते हुए वे लोगों के बीच जल संरक्षण, स्वच्छता, वृक्षारोपण एवं पर्यावरण की रक्षा का संकल्प एवं संदेश देने का कार्य कर रही हैं। इसके साथ ही, शिप्रा पाठक अध्यात्म और मानवीय मूल्यों के प्रति भी प्रतिबद्ध हैं। प्रकृति के प्रति ऐसा निश्छल प्रेम और निष्ठा सचमुच अतुलनीय है।
गंगाघाट की सफाई में जूटी संजीवनी शर्मा
संजीवनी शर्मा एक सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद हैं, जो भारत के कानपुर स्थित एक गैर-लाभकारी संगठन कानपुर प्लॉगर्स की संस्थापक हैं । वह पेशे से डेंटिस्ट हैं। एक शाम अपने बेटे के साथ कानपुर में गंगा बैराज के पास गंगा के घाटों पर उन्होंने महसूस किया कि घाट पर बहुत गंदगी है और इसमें से अधिकांश प्लास्टिक हैं, जो नदी के माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र में प्रवेश करेगा । इस विचार के बाद उन्होंने पुणे प्लॉगर्स से प्रेरणा ली और मार्च 2021 में कानपुर प्लॉगर्स की स्थापना की । और तब से वे हर एक हफ्ते में गंगा घाटों की सफाई कर रही हैं।
संजीवनी शर्मा कई वर्षों से सामाजिक कार्यों में सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं और दुनिया पर सकारात्मक प्रभाव डालने के लिए उनमें जुनून सवार हैं । उन्होंने स्थायी जीवन को बढ़ावा देने के लिए वृक्षारोपण अभियान, अपशिष्ट प्रबंधन कार्यशालाएं और प्लास्टिक प्रदूषण के हानिकारक प्रभावों के बारे में जागरूकता अभियान सहित कई पहलों का शुरूआत की है।
उनके नेतृत्व में, कानपुर प्लॉगर्स समुदाय में परिवर्तन के लिए एक बड़ी ताकत के रूप में उभरा है। संगठन ने कई प्लॉगिंग कार्यक्रम आयोजित किए हैं, जहां स्वयंसेवक कानपुर की सडक़ों, पार्कों और सार्वजनिक क्षेत्रों से कूड़े और कचरे उठाते हैं । वे एक स्वच्छ और हरित शहर को बढ़ावा देने के लिए अपशिष्ट पृथक्करण अभियान और पुनर्चक्रण (रिसाइक्लिंग) पर भी पहल करती हैं। कानपुर प्लॉगर्स ने अपने दो साल का सफर पूरा लिया है । संजीवनी जी को ‘मॉं गंगा किनारे वाली’ के नाम से भी जाना जाता है।
कुल मिलाकर, संजीवनी शर्मा एक संवेदनशील पर्यावरणविद हैं, जो स्थायी जीवन को बढ़ावा देने और अपने समुदाय पर सकारात्मक प्रभाव डालने के लिए समर्पित हैं। कानपुर प्लॉगर्स के साथ अपने काम के माध्यम से, उन्होंने अनगिनत लोगों को कार्रवाई करने और दुनिया में बदलाव लाने के लिए प्रेरित किया है ।

