यह भाषा के अविश्वसनीयता का संकट ..साहित्य मनुष्य को औसत नहीं मानता.-नंद किशोर आचार्य

बिलासपुर (जीआर)। श्रीकांत वर्मा पीठ द्वारा सिम्स ऑडिटोरियम में आयोजित तीन दिवसीय श्रीकांत वर्मा सृजन संवाद के दूसरे दिन का पहला सत्र कविता पाठ का था जिसमें कवियों ने आज के व्यक्ति समाज और चुनौतियों को कविता में पिरो कर प्रभावी पाठ किया।
त्रिलोक महावर ने ज़िंदगी क्या है..तुम्हारे आने पर ..कभी कभी कदमों के निशान..सुख इतना
संजीव बख्शी ने कैरिड बैक रॉंग साइड ,घर प्रवेश,एक जरुरी प्रमाणपत्र,कविता ने प्रभावित किया
बीजापुर की युवा कवयित्री पूनम वासम ने मायनी कुरसम कविता से बस्तर की स्त्री के आत्मसम्मान को बेहतरीन ढंग से व्यक्त किया,फिर रानी बोडली एक कड़वी याद,तीन दरवाजों वाला गांव कविता पढ़ी।
बीकानेर से आए वरिष्ठ कवि नंद किशोर आचार्य ने कविता में रघुवर सहाय को किया याद..उन्होंने गूंगा हो जाना,क्षमा प्रार्थी,आकाश उड़ रहा,आकाश आदि कविताओं से प्रभावित किया।
कवयित्री जया जाधवानी ने बेचेहरा औरतें, बहुत दूर से कविताएं पढीं।
सत्र का संचालन कर रहे महेश वर्मा ने गुड्डन के नाम की चिट्ठी, पंख,तुम्हारी बात आदि कविताएं पढ़ी
अच्युतानंद मिश्र ने उसकी याद शीर्षक से पाठ प्रारभ किया फिर
इंदौर से आये कवि आशुतोष दुबे ने डरते डरते, रविवार, विदेह, चुपचाप,  कितने एकांत, मौत के बाद, न्यूनतम के सुनसान में आदि कविताएं पढ़कर उद्वेलित लिया।
दिन का दूसरा सत्र व्याख्यान सत्र था जिसका विषय था कविता और सभ्यतिक संकट जिसमें
नंद किशोर आचार्य ने कहा कि यह
भाषा के अविश्वसनीयता का संकट है…यह मनुष्य मनुष्य के रिश्ते का संकट है…मानव अस्तित्व में गिरावट आई है।मानव संवेदन का लोप हुआ है और मनुष्य की अवधारणा में हर दृष्टिकोण से अलग अलग है।साहित्य मनुष्य को औसत नहीं मानता।हर कृति एक नए भाषा और मनुष्य के अस्तित्व की खोज करती है।
सत्र की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार रमेश चंद्र शाह ने कहा कि  सभ्यता के संकट के समाधान में साहित्य की शक्ति एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
चिंतक अच्युतानंद मिश्र ने कहा 1950 के बाद तीन तरह के परिवर्तनों ने हमारे ऊपर दबाव डालना शुरू किया। भाषा और शब्द से अर्थों को निथार लिया गया,   समय बोध को इतना सूक्ष्म कर दिया गया कि सारे अंतराल नष्ट हो गए और नैतिकता को पूंजी की ताकत ने दबोच लिया।इस तरह हमारे समय को सूचना क्रांति ने अपनी गिरफ्त में ले लिया । आज हमारा आलोचनात्मक विवेक सांस्कृतिक मूल्य सब दांव पर है।
अम्बर पांडेय ने कहा पश्चिमी दर्शन में मन एवम शरीर के विभाजन से प्रकृति एवम परिवेश से विलगाव की जो समस्या पैदा हुई।इसी समस्या को परवर्ती दार्शनिकों ने संबोधित करते हुए मनुष्य की अपने अनुभूत संसार में वापसी की वकालत की।
सत्र का प्रभावी संचालन छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष ईश्वर सिंह दोस्त ने किया।
अंतिम सत्र भोपाल से आये विहान नाट्य दल द्वारा संगीत की प्रस्तुति हुई जिसमें उन्होंने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया।
शम्पा शाह ,कुमार अम्बुज,आनंद हरशूल, अरविंद त्रिपाठी,जया जाधवानी,देवेंद्र सिंह,ईश्वर सिंह दोस्त,सतीश जायसवाल,द्वारिका प्रसाद अग्रवाल,मुदित मिश्र,रितेश नायडू,सुमित शर्मा,श्रीकुमार पांडेय,अजय पाठक,राघवेंद्र धर दीवान,महेश श्रीवास,अनु चक्रवर्ती,राजू यादव,कपूर वासनिक,अरुण दवडेकर,सुनील चिपड़े, राजेश दुआ ,संज्ञा टण्डन,हरीश पाठक और बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।
कल सुबह का सत्र कहानी पाठ का होगा और शाम को विहान नाट्य दल भोपाल द्वारा श्रीकांत वर्मा की कहानियों पर नाट्य प्रस्तुति होगी।

MRINMOY MALLICK

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